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हनुमान जी को युद्ध में हराने वाले तीन योद्धा | Was Hanuman Invincible ? Hanuman Defeats

हनुमान जी, जिनकी शक्ति का आभास मात्र से बड़े-बड़े योद्धा घुटने टेक देते हैं। उनके पराक्रम और अद्वितीय बल की कहानियां तो हमने अनगिनत सुनी हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि ऐसे भी कुछ दुर्लभ अवसर आए, जब महाबली हनुमान जी को स्वीकार करने को विवश किया गया ? कौन थे वो योद्धा, जिन्होंने इस असंभव कार्य को संभव कर दिखाया? क्या ये हनुमान जी की हार थी या उनकी अद्भुत विनम्रता और रणनीति का प्रमाण? क्या स्वेच्छा से हारे थे हनुमान, आइये विस्तार से जानते हैं वो कौन से योद्धा थे जो हनुमान जी पर हावी हुए
किस किस से हारे थे हनुमान जी
1। लव और कुश
पद्म पुराण के पाताल खंड, अध्याय 123 के अनुसार, एक समय प्रभु श्रीराम के अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा लव-कुश के आश्रम में पहुँचा। लव ने उस घोड़े को बाँध लिया, जिससे श्रीराम की सेना और लव-कुश के बीच युद्ध छिड़ गया। इस युद्ध में एक समय ऐसा आया जब कुश ने अपने बाणों से शत्रुघ्न को पराजित कर उन्हें मूर्छित कर दिया। शत्रुघ्न को गिरा हुआ देखकर सुरथ वहाँ आए और कुश के पास पहुँचकर उन पर अनेकों बाण चलाए।

तब कुश ने एक भयंकर बाण अपने हाथ में लिया। जैसे ही वह बाण छोड़ा गया, वह कालाग्नि की तरह प्रज्वलित हो उठा और सुरथ की छाती को भेदता हुआ निकल गया। सुरथ मूर्छित होकर वहीं गिर पड़े।
सुरथ के गिरने पर कुश को विजयी होते देख पवनपुत्र हनुमान ने सहसा एक विशाल शाल वृक्ष उखाड़ लिया और उसे पूरी ताकत से कुश की छाती पर दे मारा।

उसकी चोट खाकर, कुश ने अपनी माता सीता के चरणों का स्मरण किया और धनुष पर अमोघ संहारास्त्र स्थापित किया। जब हनुमान जी ने उस भयंकर अस्त्र को आते देखा, तो वे तुरंत प्रभु श्रीराम का ध्यान करने लगे।
इतने में ही वह संहारास्त्र हनुमान जी की छाती पर आकर करारी चोट कर गया। वह अस्त्र अत्यंत पीड़ा देने वाला था। उसकी चोट से हनुमान जी को तीव्र वेदना हुई, और वे मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़े।
तत्पश्चात कुश ने वानरराज सुग्रीव को वरुण पाश से बांध लिया, और इस प्रकार कुश ने सुग्रीव पर भी विजय प्राप्त की। इसी समय लव ने भी पुष्कल, अंगद, वीरमणि तथा अन्य राजाओं को परास्त कर रण में विजय प्राप्त की। दोनों भाई महाबली हनुमान जी और सुग्रीव को बांधकर अपने आश्रम ले गए। जैसे ही वे दोनों भाई आश्रम पहुंचे, वहाँ देवी सीता ने हनुमान जी और वानरराज सुग्रीव को सहसा पहचान लिया। उन्हें छोड़ने की आज्ञा देते हुए देवी सीता बोलीं, “पुत्रों, यह दोनों महान वीर और महाबलवान हैं। यह वीर हनुमान जी हैं, जिन्होंने रावण की पूरी लंका को भस्म कर दिया था।”

माता सीता ने कहा, “पुत्रों, तुमने महान अश्व को पकड़ा, अनेकों वीरों को मार गिराया और इन दोनों कपीश्वरों को भी बांध लिया। यह सब अच्छा नहीं हुआ, वीरों। तुम नहीं जानते, वह तुम्हारे पिता का ही घोड़ा है। जाओ, उस अश्व को खोल दो और इन दोनों वीरों को भी छोड़ दो।”
माता की बात सुनकर बालकों ने कहा, “हम लोगों ने क्षत्रिय धर्म के अनुसार ही यह युद्ध लड़ा है। आपकी आज्ञा से हम अभी उस अश्व और इन दोनों महाबलियों को भी छोड़ देंगे।”
माता सीता ने मन ही मन श्रीरामचंद्रजी का ध्यान किया और सबके साक्षी भगवान सूर्य की ओर देखा। फिर उन्होंने पवित्र वचन बोले। जैसे ही वह वचन उनके मुख से निकला, उसी क्षण संग्राम भूमि में नष्ट हुई पूरी सेना और उनके साथ शत्रुघ्न भी जीवित हो उठे।
2। भरत
रामचरितमानस के लंका कांड, अध्याय 180 के अनुसार, जब लक्ष्मण जी को रावण के पुत्र मेघनाद (इंद्रजीत) ने शक्ति बाण से गंभीर रूप से घायल कर दिया, तब उनके उपचार के लिए वैद्यराज सुषेण ने संजीवनी बूटी लाने का सुझाव दिया। हनुमान जी संजीवनी बूटी लाने के लिए हिमालय पर्वत पर गए, लेकिन उचित जड़ी-बूटी की पहचान न कर पाने के कारण वे संपूर्ण पर्वत ही उठा लाए।

हनुमान जी जब पर्वत लेकर आकाश मार्ग से अयोध्या के ऊपर से उड़ रहे थे, तो भरत जी ने उन्हें राक्षस समझकर उन पर बाण चला दिया। बाण लगते ही हनुमान जी “राम, राम, रघुपति” का उच्चारण करते हुए मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। राम नाम सुनकर भरत जी बड़ी उतावली से उनके पास आए।
भरत जी ने बहुत प्रकार से हनुमान जी को होश में लाने का प्रयास किया, लेकिन वे नहीं जागे। यह देखकर भरत जी का मुख उदास हो गया और वे दुखी मन से बोले, “यदि श्रीरघुनाथ जी मुझ पर प्रसन्न हैं तो यह वानर पीड़ा से रहित हो जाए।” यह वचन सुनते ही हनुमान जी “श्रीराम की जय” कहते हुए उठ बैठे।

इसके बाद, भरत जी ने हनुमान जी को अपने हृदय से लगा लिया। जब हनुमान जी ने उन्हें सारा वृत्तांत सुनाया, तो भरत जी और भी अधिक विचलित और दुखी हो गए। उन्हें बड़ा ही पश्चाताप हुआ।
तब भरत जी ने मन में धैर्य धरकर कहा, “हे तात, अब आपको जाने में देर हो जाएगी, और सवेरा होते ही काम बिगड़ जाएगा। अतः आप पर्वत सहित मेरे बाण पर चढ़ जाइए। मैं आपको वहाँ भेज दूंगा जहाँ श्रीराम जी हैं।”
भरत जी की यह बात सुनकर, एक क्षण के लिए हनुमान जी के मन में अभिमान उत्पन्न हुआ कि, “मेरे भारी बोझ को उठाकर यह बाण कैसे चलेगा?” लेकिन तुरंत ही उन्होंने श्रीराम जी के प्रभाव और भरत जी की भक्ति का विचार किया।
श्रीराम जी की महिमा का स्मरण करते हुए हनुमान जी ने अपने मन का अभिमान त्याग दिया और भरत जी के चरणों में वंदना की। हाथ जोड़कर वे विनम्रतापूर्वक बोले, “हे नाथ! आपके आदेश का पालन करना मेरा धर्म है। परंतु मैं आपको हृदय में रखकर अपनी शक्ति से तुरंत वहाँ पहुँच जाऊंगा।”
भरत जी ने उनकी बात को समझते हुए प्रसन्नतापूर्वक उन्हें विदा किया। हनुमान जी ने भरत जी की आज्ञा पाकर शीघ्रता से हिमालय पर्वत सहित अपने गंतव्य की ओर प्रस्थान किया।
3। मेघनाद
हनुमान जी द्वारा अशोक वाटिका को तहस-नहस कर देने और वहाँ उपस्थित असंख्य राक्षस सैनिकों को मार डालने की सूचना जब रावण को मिली, तो वह क्रोधित हो उठा। उसने सबसे पहले अपने सेनापति जांबुली को अशोक वाटिका भेजा, लेकिन जांबुली हनुमान जी के पराक्रम का सामना नहीं कर सका और हनुमान जी के हाथों मारा गया।

इसके बाद रावण ने अपने वीर पुत्र अक्षय कुमार को भेजा। अक्षय कुमार भी अत्यंत पराक्रमी था और उसने हनुमान जी से युद्ध करते हुए अद्भुत शौर्य का प्रदर्शन किया। लेकिन हनुमान जी के बल और कौशल के सामने वह भी टिक नहीं सका और अंततः मारा गया।
रावण ने अपने दो वीर योद्धाओं की मृत्यु से क्षुब्ध होकर अपने सबसे शक्तिशाली और पराक्रमी पुत्र मेघनाद (इंद्रजीत) को अशोक वाटिका भेजा। मेघनाद, जो अपने अद्वितीय युद्ध कौशल और मायावी शक्ति के लिए प्रसिद्ध था, ने अशोक वाटिका में प्रवेश किया।
अब, दोनों अति वेगवान और महाबली योद्धा—हनुमान जी और रावण कुमार इंद्रजीत—आमने-सामने थे। एक ओर पवनपुत्र हनुमान जी का अद्भुत बल और अजेयता थी, तो दूसरी ओर रावण के पुत्र इंद्रजीत का मायावी युद्ध कौशल। दोनों के बीच होने वाला यह महासंग्राम, शक्ति और वीरता की चरम सीमा को दिखाने वाला था।
मेघनाद ने जब हनुमान जी पर तीव्र बाणों की वर्षा की, तो पवनपुत्र हनुमान जी की गति और उनकी चपलता उन बाणों से भी अधिक तेज थी। अपनी इच्छानुसार शरीर को छोटा-बड़ा करने की क्षमता और अद्भुत कौशल के कारण वे बाणों के बीच से सरलता से निकल जाते थे। मेघनाद ने अपनी सारी मायावी शक्तियाँ, तांत्रिक विद्याएँ, और सभी प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग करके हनुमान जी को पराजित करने का प्रयास किया, लेकिन वे सब व्यर्थ सिद्ध हुए।
हनुमान जी की अजेयता और दिव्य शक्ति को देखकर मेघनाद ने यह विचार किया कि इन कपिश्रेष्ठ को मारना असंभव है। अतः उन्हें किसी प्रकार से कैद कर लेना ही उचित होगा।
यह सोचकर मेघनाद ने ब्रह्माजी द्वारा प्रदत्त अमोघ अस्त्र का स्मरण किया। उसने अपने धनुष पर उस ब्रह्मास्त्र का संधान किया और उसे हनुमान जी पर लक्षित कर छोड़ दिया। ब्रह्मास्त्र के प्रभाव से हनुमान जी बँध गए।
राक्षस योद्धा मेघनाद द्वारा ब्रह्मास्त्र से बाँध लिये जाने के पश्चात् वानरवीर हनुमान जी निश्चेष्ट होकर पृथ्वी पर गिर पड़े।

हनुमान जी ने जब ब्रह्मास्त्र का प्रभाव देखा, तो उन्हें पितामह ब्रह्मा द्वारा दिए गए वरदान का स्मरण हो आया। ब्रह्मा जी ने उन्हें वरदान दिया था कि उनका अस्त्र केवल एक मुहूर्त तक ही हनुमान जी को बांध सकेगा, उसके बाद वे स्वतः ही बंधन से मुक्त हो जाएंगे।
हनुमान जी ने विचार किया, “ब्रह्मा जी के प्रभाव के कारण इस अस्त्र से मुक्त होने की मेरी शक्ति को मान्यता दी गई है। यह सोचकर ही मेघनाद ने मुझे ब्रह्मास्त्र से बाँधा है। तथापि, ब्रह्मा जी के सम्मान की रक्षा हेतु मुझे इस अस्त्र बंधन का पालन करना चाहिए।”
इसलिए, हनुमान जी ने स्वेच्छा से अपने आपको उस ब्रह्मास्त्र के बंधन में रहना स्वीकार कर लिया।
इसके पश्चात हनुमान जी सोचने लगे, “राक्षसों द्वारा पकड़े जाने में भी मुझे महान लाभ ही दिखाई देता है। यदि वे मुझे पकड़कर रावण के समक्ष ले जाएँ, तो मुझे राक्षसराज रावण से बातचीत करने और श्रीराम का संदेश देने का अवसर मिलेगा। इससे मुझे शत्रु के मन और उनकी शक्ति को भी समझने का मौका मिलेगा। अतः, यह मेरे लिए लाभकारी होगा कि शत्रु मुझे पकड़कर अपने राजा के पास ले जाएं।”
हनुमान जी, यद्यपि ब्रह्मास्त्र के प्रभाव से मुक्त हो गए थे, फिर भी उन्होंने ऐसा आचरण किया जैसे वे अब भी उस बंधन में हों। यह उनकी बुद्धिमत्ता और रणनीति का परिचायक था। क्रूर राक्षस उन्हें कठोर बंधनों में जकड़ते और बार-बार मारते हुए घसीटकर रावण की सभा में ले गए। इस प्रकार, वानरवीर हनुमान जी ने अपनी स्वेच्छा से राक्षसराज रावण के समक्ष उपस्थित होने का मार्ग प्रशस्त किया।
कई लोग यह भ्रम रखते हैं कि मेघनाद ने हनुमान जी को पराजित कर दिया था। लेकिन यदि आप वाल्मीकि रामायण के इस प्रसंग का गहन अध्ययन करेंगे, तो स्पष्ट होगा कि हनुमान जी को मेघनाद का कोई भी अस्त्र बाँध नहीं सका। उन्होंने स्वेच्छा से और ब्रह्मा जी का सम्मान बनाए रखने के लिए ब्रह्मास्त्र के बंधन का अनुसरण किया।
रावण के समक्ष हनुमान जी ने बड़े ही निर्भीक होकर कहा, “इस समय भले ही मैं बंधन में हूँ, परंतु मुझे किसी प्रकार का भय नहीं है। ब्रह्मा जी, देवराज इंद्र और वायु देव के वरदानों से मैं अजेय और अमर हूँ। तुम्हारे साथ संवाद करना और तुम्हें राम का संदेश देना मेरे लिए आवश्यक था, इसलिए मैंने स्वयं को इस बंधन में बाँधने दिया।”
हनुमान जी ने रावण के दरबार में स्पष्ट किया कि “किसी भी दिव्य अस्त्र या बंधन से, चाहे वह राक्षसों ने चलाया हो या अन्य किसी ने, मुझे न तो बाँधा जा सकता है और न ही मारा जा सकता है। मैं यहाँ अपनी स्वेच्छा से आया हूँ, ताकि तुम्हें श्रीराम का संदेश देकर धर्म का पालन करने का अवसर दूँ।”
यह प्रकरण हनुमान जी की असीम शक्ति, विनम्रता, और कूटनीतिक बुद्धिमत्ता का उत्कृष्ट उदाहरण है। उनका उद्देश्य केवल रावण को संदेश देना और उसे धर्म के मार्ग पर लाना था, न कि अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना।
हनुमान जी को पराजित करना असंभव था, किन्तु भरत और लव-कुश हनुमान जी पर हावी अवश्य हुए थे। इसका वर्णन पुराणों एवं रामायण में जैसा है, हमने उसे यथार्थ रूप में आपके समक्ष प्रस्तुत किया। लव और कुश हनुमान जी के आराध्य श्रीराम के पुत्र थे, और भरत जी श्रीराम के भ्राता एवं स्वयं नारायण के अंश से उत्पन्न हुए थे। संभव है कि सम्मानवश हनुमान जी ने उनके समक्ष झुकने का निर्णय लिया हो।
जय बजरंग बली!